मैथिली समीक्षा : मैथिली कविताक जापानी विधा

~चन्दनकुमार झा~

वैज्ञानिक उपलब्धि, पश्चिमी विचारधाराक प्रवेश, प्राचीन परम्पराक प्रति विरक्ति, आ अन्यान्य भाषा-साहित्यक प्रभावसँ मैथिली साहित्यमे खासक’ कविताक्षेत्रमे आधुनिकताक सूत्रपात भेल । बंगलाक प्रभावसँ एकर कल्पनाशीलताक विकास भेलैक । अंगरेजी आदि भाषाक प्रभावसँ मैथिली कवितामे प्रयोगवादी परम्पराक विकास भेल । अंगरेजी काव्य साहित्यक बैलेड, सौनेट प्रभृति काव्य रीतिक प्रयोग भेल । तहिना मध्ययुगमे मिथिलाक्षेत्रमे जे उर्दू-फारसीक प्रचलन भेल छल तकर प्रभावसँ मैथिलीमे गजलक आविर्भाव भेल । हिन्दीक समानान्तर मैथिलीयोमे छायावाद, प्रगतिवाद आदि काव्यधारा आयल । बीसम शताब्दीक तेसर दशकमे मार्क्सक भौतिकवादी प्रवृति प्रगितवाद आ प्रयोगवादकेँ जन्मदेलक तँ फ्रायडक मनोविश्लेषण सामाजिक कुण्ठा ओ अव्यवस्थाकेँ मैथिली काव्यमे अभिव्यक्ति देलक । आदर्शवाद, अभिव्यंजनावाद, यथार्थवाद, साम्यवाद,समाजवाद,तदर्थवाद, अग्णिवाद, आदि अनेक विचारधारा विभिन्न कालखण्डमे आधुनिक मैथिली कविताक कथ्य तथा शिल्पकेँ प्रभावित करैत रहल अछि । साठिक दशकमे नवगीतक परिकल्पना कएल गेल जे एकतरहेँ पारम्परिक शिल्प ओ नवीन कथ्यक बीच संतुलन स्थापित करबाक एकटा अभिनव प्रयास छल, शाइत कविताकेँ अलोकप्रियतासँ बचेबाक एकटा प्रयास सेहो ।

आधुनिक युगमे मनुष्यक जीवन यंत्रवत भए गेल । व्यस्ततम जीवनक कारणेँ ओकरा लग प्रकृति दिस घूरि तकबाक समय नहि रहलैक । आधुनिकता प्रदत्त सुख-साधनक अछैतो ओकरा भीतर सदति अशांति पैसल रहैत छैक । मुदा,एहि भौतिकतावादी संस्कृतिसँ जखन ओ अकछा जाइछ तखन भावनाशील भऽ जाइत अछि । ओकर कविहृदय जागि उठैत छैक । प्रायः एहने युगधर्मक कारणेँ विश्वभरिमे लघु आकारक कविताक आकर्षण बढ़ल अछि आ भारतीय साहित्य जगतमे सेहो क्षणिका लिखबाक प्रचलन भेल तथा जापानी लघु काव्य विधा यथा- हाइकू, तांका, आदिक लोकप्रियता बढ़ल ।

जापानमे लघुआकारक कविता लिखबाक परम्परा लगभग ओतबे पुरान अछि जतेक मैथिली साहित्यक इतिहास । चोका, सेहोका, तांका अथवा वाका,एकर प्रचीनतम काव्यविधा थिक । तांका एक प्रकारक लघुगीत होइत अछि जाहिमे लयात्मकताक गुण विद्यमान रहैत छैक । आठम शताब्दीक अंतसँ बारहम शताब्दी धरि तांका शैलीक कविताक जापानमे खूब प्रचलन भेल । तांका पाँच पाँतिक रचना होइत अछि जाहिमे प्रत्येक पाँतिमे क्रमशः ५-७-५-७-७, कुल ३१ वर्ण होइत छैक । एकर मूल विषय प्रेम तथा शृंगार छल तथा जापानक राजदरबारमे एकरा विशेष प्रश्रय ओ प्रोत्साहन भेटलैक । जापानक सम्राटक आदेशपर “कोकिन्शू” नामक संग्रहक प्रकाशन सेहो भेल । बारहम शताब्दीमे एकटा नव काव्य-पद्धतिक जन्म भेलैक जकर नाम “रेंगा” पड़लैक । एहि पद्धतिक अन्तर्गत तांका’क पहिल तीन पाँति (५-७-५ वर्णक) एक कवि द्वारा तथा अन्तिम दू पाँति (७-७ वर्णक) दोसर कवि द्वारा लिखल जाइत छल । आरम्भमे एकर विषय हास्य-व्यंग केन्द्रित छल मुदा बादमे एकर विषय-वस्तुमे गम्भीरता अबैत गेलैक । तांका तथा रेंगा पद्धतिक जापानी कविताक प्रथम तीनपाँतिमे जे बिम्ब सृजित होइत अछि, अन्तिम दू पाँतिमे तकर पूर्ण अभिव्यक्ति होइत अछि । सोलहम शताब्दी अबैत-अबैत एहि नवीन प्रयोगक आधारपर एकटा नव काव्य विधा’क आविष्कार भेलैक जाहिमे तांका कि रेंगा’क अन्तिम दू पाँति (७-७ वर्णक)क त्याग कएल गेल । एकर नाम पड़ल होक्कू तथा एकर स्वरूप तीन पाँतिक बनल जाहिमे हरेक पाँतिमे क्रमशः ५-७-५ आखर राखल गेल । कालान्तरमे एकरे नाम ‘हाइकू’ भेल । बाशो, बुसोन ओ इत्सा जापानक प्रसिद्ध हाइकुकार भेलाह ।

हाइकूक विषयवस्तु अनिवार्यतः प्रकृति केन्द्रित होइत अछि । संक्षिप्तता तथा तीक्ष्ण प्रभावोत्पादकता एकर मूल विशिष्टता थिक । प्रकृति प्रेम, कल्पना, मानवीय प्रेम, करूणा आदिक चरमानुभूतिक अभिव्यक्तिक लेल जखन शब्द-संकट उत्पन्न भए जाइत अछि, हाइकू तखने जन्म लैत अछि । हाइकू शीर्षकहीन होइछ तथा एहिमे जतेक कहल जाइछ ताहिसँ बेसी अनकहल रहि जाइछ मुदा, एहि सांकेतिक अभिव्यक्तिमे अर्थक अपूर्णता नहि रहैत छैक । हाइकु’क अभिव्यक्तिगत विशेषताक विषयमे डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ केर विचार उल्लेखनीय अछि । ओ कहैत छथि- ” हाइकुमे क्षण विशेषक अमित अनुभवक अभिव्यक्ति बिना शीर्षकमे बन्हने रहैत अछि……हाइकुक प्रत्येक पंक्तिक अपन महत्व छैक । पहिल पंक्तिमे विषयक उपस्थापन रहैत अछि, दोसर पंक्तिमे संयोजित प्रतिक्रिया होइछ आ तेसर पंक्तिमे विरोधाभासपूर्वक जिज्ञासा रहैत अछि । एही जिज्ञासाभावसँ पाठकक बौद्धिक धरातलपर लहरि उठि, तरंगित होइत अर्थक अछोरताक अण्वेषणक लेल प्रेरित करैत अछि “( आँजुर अप्रैल-मइ-२०१४ पृ. २३) पछाति हाइकू’एक प्रारूपमे जापानमे एकटा अन्य काव्यविधा प्रचलित भेल–शेर्न्यू । एकर विषय वस्तु प्रकृति केन्द्रित नहि अपितु हास्य-व्यंग्य आधारित होइत अछि । हाइकू वा शेर्न्यू’क अभिव्यक्ति विशिष्टता ओ स्वरूपगत मौलिकताक संरक्षण हेतु, एकर काव्यानुशासन अनुपालन आवश्यक अछि । कोनो सत्रह आखरक पाँतिकेँ मात्र ५-७-५ आखरक तीन पाँतिमे बाँटि देलासँ हाइकू’क रचना नहि भए सकैत अछि । एहि तिनपतिया सभक तीनू पंक्ति पूर्ण तथा ५-७-५ आखर’क हो । जँ तकर अनुपालन नहि कएल गेल अछि तँ एहि तरहक रचनाकेँ क्षणिका, आदि मुक्त काव्यविधा’क अन्तरगत राखल जेबाक चाही । अधिकतर भारतीय भाषा’क मध्य हाइकू तथा शेर्न्यूकेँ अलग नहि कएल गेल अछि आ दुनू’क एकीकरण करैत एहि तरहक समस्त रचनाकेँ हाइकू रीति’क अन्तर्गत राखल गेल अछि । मैथिलीक आरम्भिक शेर्न्यू सभकेँ सेहो हाइकू-ए कहल जाइत रहल अछि मुदा, आब इहो विचारनीय विन्दु थिक जे हाइकू तथा शेर्न्यू रीतिमे लिखल जाएबला मैथिली तिनपतिया सभकेँ ओहिमे वर्णित विषय-वस्तुक आधारपर अलग-अलग वर्गीकृत कएल जाए वा नहि ?

भारतीय साहित्यमे हाइकूक प्रवेश अँगरेजी’क माध्यमसँ भेल । आरम्भमे अँगरेजीक माध्यमसँ जापानी हाइकू’क विभिन्न भारतीय भाषामे अनुवाद कएल गेल । हँलाकि ई अनुवाद सभ मूल हाइकू जकाँ काव्यानुशाशित नहि छल । भारतमे सर्वप्रथम १९१९ई.मे रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपन जापान यात्राक उपरान्त जापानी हाइकुकार बाशो’क दूटा हाइकुक बांग्लामे भावानुवाद प्रस्तुत कएलनि ।

पुरोनो पुकुर
बेंगेर लाफ
जलेर शब्द

तथा

पोचा डाल
एकटा काक
शरत्काल

बीसम शताब्दीक उत्तरार्धमे हिन्दी साहित्यमे हाइकू’ लेखन आरम्भ भेल । १९५९ ई.मे अज्ञेय’क कविता संग्रह- अरी ओ करुण प्रभामय’मे किछु जापानी हाइकूक अनुवाद ओ किछु ताहिसँ प्रेरित मौलिक रचनाक प्रकाशन भेल । तकरबाद अन्यान्य भारतीय भाषामे सेहो जापानी हाइकूक अनुवाद ओ मौलिक हाइकू लेखन आरम्भ भेल । असमिया कवि नीलमणि फूकन केर जापानी हाइकूक अनुवाद १९७१मे “जापानी-कविता”नामक संकलनमे प्रकाशित भेल । गुजराती कवि स्नेहरश्मि ५-७-५ केर काव्यानुशासनक अनुपालन करैत हाइकू लिखलनि । हिनक पहिल हाइकू संग्रह १९६७मे प्रकाशित’सोनेरी चाँद रूपेरी सूरज” थिक जाहिमे ३५९ गोट हाइकू संकलित अछि । स्नेहरश्मिकेँ भारतीय साहित्यक प्रथम सफल हाइकुकार मानल जाइत अछि । १९८८ई.मे गुजराती साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित”सनराइज ऑन स्नोपिक्स” हिनक दोसर हाइकु संग्रह थिक जाहिमे ३०४ गोट मौलिक गुजराती हाइकु हिन्दी तथा अँगरेजी अनुवाद’क संग संकलित अछि । आरम्भिक समयमे गुजरातीक बाद मराठीमे हाइकू सभसँ अधिक लिखल गेल । मराठीमे हाइकूक मूल स्वरूप-विधान अर्थात ५-७-५ केर अनुपालन नहि भेल आ ७-९-७ केर वर्णक्रम अपनाओल गेल मुदा, एकर भाव-चेतना जापानी हाइकू सदृश अछि । शिरिष पै मराठी’क प्रमुख हाइकुकार भेलाह । १९८६ई.मे “हाइकु” नामक संकलनक प्रथम खण्डमे हुनक ७२ गोट मौलिक मराठी हाइकु प्रकाशित भेल ।१९७८,मे मराठी साहित्यिक पत्रिका ऋचाक हाइकु विशेषांक सेहो बहरायल । सिन्धी कवि नारायण श्याम ११-१३-११ मात्राक्रममे, अर्थात् दोहाक अन्तिम तीन चरणक उपयोग करैत, हाइकू लिखलनि जाहिमे पहिल आ तेसर पाँति तुकान्त अछि । हिनक हाइकू सभ ‘माकभिना’मे संकलित भेल । एकर अलावे बंगाली, कन्नड़, पंजाबी, नेपाली, मगही,भोजपुरी, संस्कृत, आदि अनेक भाषामे बीसम शताब्दीक उत्तरार्धमे हाइकू’क विकास भेल तथा प्रचुर मात्रामे लिखल जा रहल अछि । १९७७ई.मे प्रकाशित डा. सत्यभूषण वर्माक ‘जापानी कविताएँ” हाइकूपर केन्द्रित हिन्दीक महत्वपुर्ण कृति थिक । वर्तमान समयमे भारतीय भाषामे हाइकूक विकासक हेतु अनेक पत्रिका ओ ब्लॉगक संचालन भए रहल अछि । अमृता प्रीतम जापानी हाइकूक अनुवाद पंजाबीमे कएलनि । संस्कृत भाषामे हाइकूक विकासक हेतु श्रीमती रंजना रश्मिक उल्लेखनीय योगदान अछि । उदाहरण स्वरूप हिनकर किछु हाइकु देखल जाए-

1.
अस्माकं धरा
सदैव रत्नगर्भा
आसीत् अस्ति च

2.
विश्वासं कुरु
अहं तवैव अस्मि
आसीत् च भेवत्

(http://www.articlesbase.com/ Sanskrit Haiku: A Unique Contribution of Smt. Ranjana Rashmi A Critical Evaluation of Smt. Ranjana Rashmi’s Sanskrit Haikus by Dr. Rakesh Ravi)

नेपाल तथा जापानक बीच बौद्ध धर्मक लाथेँ अन्तराष्ट्रिय सम्बन्ध प्रगाढ़ रहलैक अछि । बीसम शताब्दीक आरम्भहिसँ नेपाली छात्र लोकनि जापानी सिखबाक हेतु जापान यात्रा करैत रहलाह अछि । प्राप्त सूचनाक मोताबिक साल २०१९ (१९६२ई.)मे शंकर लामीछाने’क पहिल हाइकू नेपाली साहित्यिक पत्रिका रूपरेखामे प्रकाशित भेल ।

सूर्योदय

माकुरा जाल
झोल्लिएको ओसले
तन्किंदै गयो ।

(शंकर लामीछाने – रुपरेखा २०१९ भदौ पृष्ठ ३४ )

वर्ष २००५मे नेपाल निप्पन रिसर्च सेन्टर आ नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक संयुक्त आयोजनामे काठमाण्डु राष्ट्रिय हाइकु महोत्सव २०६२ केर आयोजन भेल छल । डॉ. रामदयाल राकेश, चेतनाथ धमाल आदि’क योगदान नेपाली हाइकूक विकासमे लेल महत्वपूर्ण अछि । तहिना वर्ष २००८ई.मे भारतमे विश्व हाइकू सम्मेलन भेल । वर्ष १९९९ईमे मगही साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘तितकी’नामक हाइकू संकलन प्रकाशित भेल ।

मैथिलीमे विगत शताब्दीक पाँचम दशकमे लघुआकारक कविता लिखबाक शुरुआत भेल । १९६५ई.मे प्रकाशित सोमदेवक कालध्वनिमे संकलित तेइसटा तिनपतिया ताहि समयक लिखल थिक । बादमे कोलकातासँ वीरेन्द्र मल्लिक तथा गुणनाथ झा’क संयुक्त संपादनमे “मि” नामक पत्रिकाक प्रकाशन १९७०ई. मे आरम्भ भेल जाहिमे छोट-छोट आकारक रचनासभ प्रकाशित होइत छल । प्रायः एहि समयमे मैथिली काव्यक्षेत्रमे जापानी काव्यविधा हाइकू, शेर्न्यू , तांका आदिक प्रवेशक पृष्ठभूमि तैयार भेल । कालध्वनिमे संकलित तिनपतिया सभ हाइकू सँ प्रेरित तँ अवश्य बुझना जाइत अछि मुदा, एकर कोनो निश्चित स्वरूप कि वर्णविन्यास नहि छैक संगहि प्रत्येक तिनपतिया’क शीर्षक सेहो देल गेल अछि जे हाइकूमे नहि रहैत छैक । वर्ष १९८९ई.मे जनकपुरसँ प्रकाशित जनक पत्रिकामे कुबेर घिमिरे’क किछु लघु कविता प्रकाशित भेल जकरा ओएकटा नवीन विधा छौंक’क नाम देने छथि । छौंकमे दू पाँतिसँ सात पाँतिक कविता सभ अछि जकर संकलन २००५ई.मे प्रकाशित भेल । स्पष्ट अछि जे विगत शताब्दीक आठम दशकमे मैथिलीमे लघुकविताक लेखन बेस प्रचलित भ’ गेल । तखन एहि कालखण्डमे मैथिलीमे हाइकू लिखल गेल तकर कोनो ठोस प्रमाण एखनधरि हमरा नहि भेटल अछि । एहि प्रकारेँ मैथिलीमे जापानी विधाक आगमन सर्वप्रथम कहिया आ केना भेल से एखनो अनुसंधानक बात थिक । मुदा, एहिमे कोनो टा शंका नहि जे बीसम शताब्दीक अन्तिम दशकमे मैथिलीमे हाइकू खूब लिखल जाए लागल । इहो प्रतीत होइत अछि जे मैथिलीमे जापानी लघु काव्य विधा सभक आगमन नेपालक रस्ते भेल ।

१९९३ई.सँधीरेन्द्र प्रेमर्षिक संपादनमे काठमाण्डुसँ प्रकाशित अन्तर्देशीय पत्रिका ‘पल्लव’मे हाइकूक नियमित प्रकाशन होइत छल । सुनिल पुरी,अनिल विश्वबन्धु, रामकैलाश मैथिल, सन्तोष गिरि,धर्मेन्द्र विह्वल, आदि एहि पत्रिकाक प्रमुख हाइकूकार भेलाह । डा. रामदयाल राकेश, निमिष झा, विजेता चौधरी आदि हाइकूमे कलम चलौनिहार अन्य विशिष्ट नेपालीय मैथिली साहित्यकार छथि। पल्लवमे हाइकू प्रकाशनक पृष्ठभूमि जनबैत धीरेन्द्रप्रेमर्षि एकटा इमेल केर माध्यमसँ जनबैत छथि-“पल्लवक परिकल्पना हम मैथिलीमे रचनाशीलता बनौने रहबाक सस्त आ सार्थक मार्गक रूपमे कएने रही। पत्रिकाक छोट कलेवरकेँ दैखैत मैथिली साहित्य आ गतिविधिसम्बन्धी छोटछोट विधा, शैली तथा सामग्री परसबादिस हमसभ विशेष साकांक्ष रही। एही समयमे हमरा नेपाली भाषामे लिखल क्षेत्रप्रताप अधिकारी, डा. अभि सुवेदी, डा. रामदयाल राकेश आदिक हाइकूसम्बन्धी किछु आलेख आ हाइकूक किछु पोथी सेहो पढ़बाक अवसर भेटल। तत्कालीन समयमे पल्लवसन सृजनशीलताक संवाहक माध्यम लेल खोरिस जुटएबाक आवश्यकतासँ प्रेरित भऽ हम हाइकूक आधारभूत नियम ५–७–५ क आधारपर किछु हाइकू लिखलहुँ। पल्लवक पहिल अंकमे हाइकू लेखनसम्बन्धी सामान्य नियमक जानकारी दैत अपन किछु हाइकू सेहो छपबौलहुँ। ओही समयमे हम धर्मेन्द्र (विह्वल) केँ सेहो संग राखि एकर नियम आदिक मादे जानकारी देलियैक आ ओहो ओहि समयमे किछु हाइकू रचना कएलनि।” एकर प्रवेशांकमे प्रकाशित धीरेन्द्र प्रेमर्षिक एकटा हाइकू द्रष्टव्य अछिः-

साँपक डीह
गुजगुज अन्हार
हम्मर गाम ।

२००४ई.मे हाइकू अध्ययन, नेपाल द्वारा प्रकाशित धर्मेन्द्र विह्वलक “एक समयक बात” मैथिलीक पहिल आ प्रायः एखनधरिक एकमात्र हाइकू संग्रह थिक जाहिमे करीब डेढ़ सय हाइकू प्रकाशित अछि । प्रस्तुत अछि एहि संग्रहक एकटा हाइकूः-

सर्द छै राति
सभ किछु सर्द छै
सेहन्ता सेहो

एहिसँ पूर्व आरम्भ’क सितम्बर २००१ई. केर अंकमे रामलोचन ठाकुरक पाँच गोट हाइकू प्रकाशित भेल जे २००३मे हिनक कविता संग्रह “लाख प्रश्न अनुत्तरित”मे संग्रहित अछि । ई हाइकू सभ तत्कालीन भारतीय राजनैतिक व्यवस्थापर कविक व्यंगात्मक प्रहार थिक । प्रस्तुत अछि दू गोट हाइकूः-

१.
एक हवाला
अनेक रूप-रंग
गणतंत्रक

२.
म सँ मंडल
मुसलिम वा मार्क्स
दिल्ली पहिने

एम्हर आबि अनेक काव्य-संग्रहमे हाइकू, शेर्न्यू, तांका आदिक प्रकाशन भेल अछि । समकालीन हाइकू रचनाकारमे धीरेन्द्र प्रेमर्षि, धर्मेन्द्र विह्वल, गजेन्द्र ठाकुर, उमेश मंडल, शिवकुमार झा टिल्लू, चंदनकुमार झा, आदि प्रमुख छथि जिनकर सैकड़ो रचना प्रकाशित भेल अछि वा प्रकाशनक बाट ताकि रहल अछि । २००९ई.मे प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर’क पद्य-संग्रह “सहस्राब्दीक चौपड़पर”मे हिनक बारह गोट हाइकू संकलित अछि । हिनक दोसर काव्य संग्रह “सहस्रजित” जे वर्ष २०१२मे प्रकाशित भेल ताहिमे एक सयसँ अधिक हाइकू, शेर्न्यू, तांका, आदि जापानी काव्यविधाक मैथिली रचना संगृहित अछि । उक्त संग्रहसँ हिनक एक गोट हाइकू ओ एक गोट शेर्न्यू एतय प्रस्तुत अछिः-

१.
रंग छाड़ल
पहाड़ आ गाछ
मुदा जीवन (शेर्न्यू)

२.
सूर्यक पूब
आशाक छै किरण
शांत-प्रशांत (हाइकू)

२००९ईमे उमेश मण्डलक कविता संग्रह निश्तुकी सेहो प्रकाशित भेल जाहिमे हिनकर १०६ गोट तांका, १०० शेर्न्यू तथा ३० गोट हाइकू संकलित अछि । –

रौद-बसात

शीतलहरि धुनि
गरमी जाड़
वसंतसँ बहार

मिथिलाक इयार (टनका-निश्तुकीसँ)

एकर अलावे धीरेन्द्र प्रेमर्षि करीब तीन सय हाइकू लिखने छथि जाहिमेसँ किछु विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित अछि तँ किछु एखनो अप्रकाशित अछि । तहिना शिवकुमार झा टिल्लूक करीब डेढ़सय तांका आ हाइकू अप्रकाशित अछि । हिनकर २०१३मे प्रकाशित कविता संग्रह “क्षणप्रभा”मे मात्र तीन टा हाइकू संकलित अछि । एतय सूचना देबय चाहब जे हमर एकटा हाइकू-शेर्न्यू संग्रह प्रकाशनक क्रममे अछि । एकर अलावे ज्योति सुनीति चौधरी, मिहिर,अमित मिश्र, सुनील झा, कुमार राधारमण, पंकज चौधरी, प्रभृति अनेक नवपिढ़ीक रचनाकार लोकनि मैथिलीमे हाइकू, शेर्न्यू, तांका आदिक रचना कएने छथि । मैथिली कविताक एहि नव्यतम विधाक विकासक हेतु इन्टरनेट पर अनेक ब्लॉग ओ पत्रिका अपन योगदान दए रहल अछि ।भाषा वैज्ञानिक लोकनि मानब छनि जे भारतीय भाषा सभक उच्चारण पद्धति जापानी भाषासँ बहुत मेल खाइत अछि आ तेँ भारतीय भाषामे एहि जापानी काव्यविधा सभक विकासक प्रचूर संभावना अछि । अल्पावधियेमे मैथिली रचनाकारक मध्य हाइकू’क लोकप्रियताक पाछाँ इहो एकगोट महत्वपूर्ण कारण थिक ।

समकालीन मैथिली हाइकू-शेर्न्यू-तांका आदि अपन अर्थवत्ता ओ काव्यानुशासनक पालन हेतु विशिष्ट अछि । एखनधरिक अधिकांश हाइकू-शेर्न्यूमे गहन भावबोध तथा चरम अनुभूतिक प्रखर अभिव्यक्ति भेल अछि । एहिमे सामाजिक परिवेशक ओ मानवीय सम्वेदनाक चित्रणक प्रमुखता रहल अछि । शेर्न्यू ओ तांका’क माध्यमे सामाजिक ओ राजनैतिक विसंगति प्रश्न ठाढ़ कएल गेल अछि । उत्तरआधुनिक चिन्तनक पश्चात समकालीन साहित्यमे जखन जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, मानवीय मूल्यक संरक्षण तथा मानवीय संवेदना-सरोकारक जागरण-संवर्द्धन आदि चिन्तनक प्रमुख विषय बनि गेल अछि तखन मैथिली कविताक विकासयात्रामे हाइकू-शेर्न्यू सन प्रभावकारी, प्रकृति ओ मानव केन्द्रित काव्यविधाक विकासक महत्व बहुत बढ़ि जाइत अछि । मैथिली हाइकूमे विलुप्त होइत मिथिलाक लोकसंस्कृति तथा मैथिलीक ठेठ शब्दावलीक खूब प्रयोग भ’ रहल अछि । एहि तरहेँ मैथिली कविताक ई जापानी विधा सभ भविष्यमे मिथिलाक सांस्कृतिक पहिचान ओ मैथिलीक विलुप्त होइत शब्दक संरक्षणमे सेहो सहायक सिद्ध भ’ सकैत अछि ।

हम सभ जनैत छी जे,वर्तमान युग इन्टरनेट, इमेल ओ इलेक्ट्रानिक टेक्स्ट’क युग थिक । थोड़बे शब्दमे अधिकसँ अधिक कहब आजुक युगक बाध्यता आ विशेषता दुनू छैक । एहनामे मैथिली कविताक ई जापानी विधासभ एकरा हेतु वृहत पाठकवर्ग तैयार कए सकैत अछि, पाठकक संग सुलभतासँ संवाद स्थापित कए सकैत अछि । अतः आवश्यक अछि जे आगामी समयमे मैथिली हाइकू, शेर्न्यू, तांका, आदि जापानी काव्यविधाक विकास हेतु सम्मिलित प्रयास कएल जाए ।

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