Tag Archives: Maithali Gazal

मैथिली गजल : निक विचार नञि देखलाैं

~हृदय नारायण यादव ‘मैथिल सुमन’~ अहाँ भितर निक विचार नञि देखलाैँ कहियाे, विश्वास कsसकी अाे विचार नञि देखलाैँ कहियाे, अहाँ भितर निक विचार नञि देखलाैँ कहियाे, विश्वास कsसकी अाे विचार नञि देखलाैँ कहियाे, अहाँ भितर निक विचार नञि देखलाैँ कहियाे…

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मैथिली गजल : केहन बात केलक ओ

~गजेन्द्र गजुर~ आखिए आखिए मे केहन बात केलक ओ॥ अपन जिनगी सँ क्षणमे कात केलक ओ॥ बिन छपरी केर हमर नेहक निवास॥ बुने बन सँ जहरक बर्षात केलक ओ॥

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मैथिली गजल : बेर बेर सवाल

~गजेन्द्र गजुर~ बेर बेर सवाल हमर याह रहैछै सत्य बात किए लगैत बेजाह रहैछै अपना टाग्ङ तर दाबल रहलो पर कछेर प पुहुचेने किए नाह रहैछै

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मैथिली गजल : पिअरगर यौ

~धिरेन्द्र प्रेमर्षि~ जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर–बुदुर की हेतै कपार! एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ कुच्ची–कलमक रूप सुरेबगर रहलै, रहतै … Continue reading

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मैथिली गजल : डर लगैए

~रोशन जनकपुरी~ नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए

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मैथिली गजल : जर्सी छी

~धीरेन्द्र प्रेमर्षि~ सिहकैत कनकन्नीमे सीटर छी, जर्सी छी मखा-मखा प्रेम करी, मोनक प्रेमर्षि छी चानक धियानमे धरती नहि छूटए, तेँ डिहबारक भगता हम दूरक ने दर्शी छी

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मैथिली गजल : जाइ छै

~डा राजेन्द्र विमल~ नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी, फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने, गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै चान भादवक अन्हरिये कटैत अहुरिया, नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे बिछा चानीक इजोरिया कोजगरामे … Continue reading

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मैथिली गजल : कुच्चा छै

~धिरेन्द्र प्रेमर्षि~ शासनके लोडहीतर लोक बनल कुच्चा छै लोडहपर हाथ जकर अगबे सब लुच्चा छै कहने छल जत्ते छै खधिया हम पाटि देब वैषम्यक ठाढ मुदा पर्वत समुच्चा छै

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मैथिली गजल : चोख फार भेल छी

~धीरेन्द्र प्रेमर्षि~ घसाइत आ खिआइत चोख फार भेल छी गला-गला गात गजलकार भेल छी शब्दकेर महफामे भावक वर-कनियाँ लऽ सदिखन हम दुलकैत कहार भेल छी धधराक धाह मारऽ पोखरि खुनाएल अछि

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मैथिली गजल : एखन बाँकी अछि

~रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’~ करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि

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मैथिली गजल : आजादी

~गजेन्द्र गजुर~ आजादीके ज्वाला दनकैत रहतै, ओसब ओहिना फनकैत रहतै, जुलुम कले चिच्यानञि रति भरि, चाहे बिरुद्धमे सनकैत रहतै,

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मैथली गजल : जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ

~धीरेन्द्र प्रेमर्षि~ जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर–बुदुर की हेतै कपार! एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ

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