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मैथिली रचना / Maithili Rachana

मैथिली मुक्तक : गाम–घर डूबल

~विनीत ठाकुर~ नदी–नाला मे चलैय पानि अगम–अथाह वर्षा सँ भेल जनता केँ जिनगी तवाह ढहल पहाड़ कतेको

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मैथिली मुक्तक : किएक नहि डरत

~गजेन्द्र गजुर~ मेहनत-बलसँ केहनो पत्थर फूटाए जाइछै । अन्हारो घरमे रोटी मुहँमे घोटाए जाइछै , किएक नहि डरत

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मैथिली गजल : निक विचार नञि देखलाैं

~हृदय नारायण यादव ‘मैथिल सुमन’~ अहाँ भितर निक विचार नञि देखलाैँ कहियाे, विश्वास कsसकी अाे विचार नञि देखलाैँ कहियाे, अहाँ भितर निक विचार नञि देखलाैँ कहियाे, विश्वास कsसकी अाे विचार नञि देखलाैँ कहियाे, अहाँ भितर निक विचार नञि देखलाैँ कहियाे…

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मैथिली मुक्तक : ऋतुराज वशन्त

~विनीत ठाकुर~ फूल प्रकृतिकेँ श्रृंगार छी हम बगियाकेँ सुन्दर उपहार छी हम केव तोरु नै

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मैथिली मुक्तक : प्रिय प्राण हमर

~विनीत ठाकुर~ अहाँ छी जीनगीक चान हमर अहीँ पर सदिखन ध्यान हमर ई मधुर

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मैथिली मुक्तक : माय मिथिला

~विनीत ठाकुर~ माय मिथिलाकेँ संतान अहाँ राखु पूर्वजकेँ मान अहाँ छोडि़कऽ

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मैथिली कविता : संघर्ष

~विनीत ठाकुर~ संघर्षक पथ पर हौसला बुलन्द अछि जीत आव लग अछि नै कानु माय जल्दिए लौटव हम अधिकार प्राप्तिक संग अहाँक शरण मे ।

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मैथिली मुक्तक : उलझन

~विनीत ठाकुर~ दहेज सँ खरिदल दुलहा पर भाग कि निक निशारात्रि मे अनोना दुलारक राग कि निक

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मैथिली कविता : बापक ब्यथा

~रंजित निस्पक्ष~ केहन निर्लज तों भेले ओली, बापक नाम हँसेले रै ! केहन बंशमें जन्म भेलौ तोहर, खन्दानक नाम घिनेले रै ! बढ घिर्णित हम भेनौ ओली, जे जन्म देलियौ हम तोरा रै ! अई स बरहिंया निपुतरे रहितौं, नै होइतौं अपहेलित,अपमानित रै ! केहन निर्लज………………! केहन बंशमें………………..!

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मैथिली गजल : केहन बात केलक ओ

~गजेन्द्र गजुर~ आखिए आखिए मे केहन बात केलक ओ॥ अपन जिनगी सँ क्षणमे कात केलक ओ॥ बिन छपरी केर हमर नेहक निवास॥ बुने बन सँ जहरक बर्षात केलक ओ॥

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मैथिली गजल : बेर बेर सवाल

~गजेन्द्र गजुर~ बेर बेर सवाल हमर याह रहैछै सत्य बात किए लगैत बेजाह रहैछै अपना टाग्ङ तर दाबल रहलो पर कछेर प पुहुचेने किए नाह रहैछै

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मैथिली कविता : शान्ति सन्देश

~विनीत ठाकुर~ ए ! शान्तिदूत परवा उड़िकऽ आ अप्पन देशमे फैलऽवै तों शान्ति हिमाल, पहाड़ आ मधेशमे एतऽकेँ सभ नर–नारी अछि शान्तिकेँ पूजारी सहत कोना हिंशा पसरल अछि समस्या भारी हिमालक अमृत जलमे मिलिगेल शोनितकेँ धारा

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मैथिली कविता : जाइतक टुकरी

~विनीत ठाकुर~ जाइतक टुकरी नै ऊँच–नीच महान् छी हम सब मैथिल मिथिला हमर शान होइ छै एकेटा धरती एकेटा आकाश पिवैत छी सबकिओ एकेटा बतास चाहे ओ पंडित हो, पादरी आ खान

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मैथिली गजल : पिअरगर यौ

~धिरेन्द्र प्रेमर्षि~ जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर–बुदुर की हेतै कपार! एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ कुच्ची–कलमक रूप सुरेबगर रहलै, रहतै सबदिनमा जखन अन्हरिया पसरल होइक, मशाले लगए पिअरगर यौ

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मैथिली गीत : बेटीक भाग्य विधान

~विनीत ठाकुर~ बीसम बसन्त जाहि घर बीतल सेहो घर भेल आब आन किया विधना फेरि(फेरि कऽ लिखे बेटीक भाग्य विधान के आब भोरक भुरुकबामे उठि कऽ चुनत बागक फूल एतबो नै कोना सोचलन्हि बाबा कोना पठाबथि दोसर कूल

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मैथिली कविता : प्रजातन्त्र रामलीलाक मञ्च

~रोशन जनकपुरी~ सन्दर्भ : वर्तमान १) देश खीरा जे ऊपर सँ सौँस होइछै आ भीतर सँ फाँकफाँक । २) राजनीति

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मैथिली कविता : चहुँदिश अमङ्गल

~विनीत ठाकुर~ स्वार्थेबस मानव उजारलक ओ जङ्गल । तैं धरती पर देखल चहुँदिश अमङ्गल ।। ठण्ढी में कनकनी गर्मी में अधिक गर्मी । नदी नाला के आब बन्द भऽ गेल सर्बी ।।

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मैथिली कविता : कम्प्यूटरक दुनिया

~विनीत ठाकुर~ ईन्टरनेट, ईमेल कम्प्यूटर के दुनिया । च्याटीङ्ग पर भेटल हमर ललमुनिया ।। नाम ओकर भाई जेहने छै अलका । तेहने ललितगर केश ओकर ललका ।।

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मैथिली गजल : डर लगैए

~रोशन जनकपुरी~ नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए

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मैथिली गीत : जे करथि घोटाला

~विनीत ठाकुर~ जे करथि घोटाला छथि अखन बोलबाला चलत कोना ई दुनिया कह रे उपरबाला गाम–नगर में बैइमान वनमे घुमै सैतान मानब भऽ दानब वनि करै सज्जनक अपमान

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मैथिली कथा : अग्‍निपुष्‍पके गुच्‍छासब

~रोशन जनकपुरी~ दुश्‍मनके नाइट भिजन हेलिकप्‍टर सँ राइत भइर बमबारी के बादो जनसेनाद्वारा कएल गेल घेराबन्‍दी नइ टुटल रहइ । जेना सिनेमा मे होइछै, चहुदिस पसरल अन्‍हारमे एम्‍हर बम खइस रहल अइ, ओम्‍हर बम खइस रहल अइ आ लोकसब दौड रहल अइ चइल रहल अइ , तहिना शाही सेना के घेराबन्‍दी कएने जनसेना मुख्‍य मोर्चा पर लइड रहल छल । पढ्नेक्रम जारी राख्नुहोस् →

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मैथिली गजल : जर्सी छी

~धीरेन्द्र प्रेमर्षि~ सिहकैत कनकन्नीमे सीटर छी, जर्सी छी मखा-मखा प्रेम करी, मोनक प्रेमर्षि छी चानक धियानमे धरती नहि छूटए, तेँ डिहबारक भगता हम दूरक ने दर्शी छी

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मैथिली कविता : भरल नोर में

~विनीत ठाकुर~ केहन सपना हम मीता देखलौँ भोर में । माय मिथिला जगाबथि भरल नोर में ।। कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल । छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल ।।

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मैथिली गजल : जाइ छै

~डा राजेन्द्र विमल~ नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी, फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने, गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै चान भादवक अन्हरिये कटैत अहुरिया, नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे बिछा चानीक इजोरिया कोजगरामे आइ, खेलए झिलहरि लहरिपर ओलरि जाइ छै

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मैथिली कविता : कोरो आ पाढि

~विनीत ठाकुर~ गरीब छोरि कऽ के बुझतै गरीबीके मारि । ओ तऽ पेटे लेल जरबै छै कोरो आ पाढि़ ।। भेल छै स्वार्थी सब नेता अपने स्वार्थे में चूर । छिनलकै जे सपना सुख भऽ गेलैक कोसो दूर ।।

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मैथिली गजल : कुच्चा छै

~धिरेन्द्र प्रेमर्षि~ शासनके लोडहीतर लोक बनल कुच्चा छै लोडहपर हाथ जकर अगबे सब लुच्चा छै कहने छल जत्ते छै खधिया हम पाटि देब वैषम्यक ठाढ मुदा पर्वत समुच्चा छै

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मैथिली गजल : चोख फार भेल छी

~धीरेन्द्र प्रेमर्षि~ घसाइत आ खिआइत चोख फार भेल छी गला-गला गात गजलकार भेल छी शब्दकेर महफामे भावक वर-कनियाँ लऽ सदिखन हम दुलकैत कहार भेल छी धधराक धाह मारऽ पोखरि खुनाएल अछि

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मैथिली कविता : गाम–नगर में

~विनीत ठाकुर~ गाम–नगर में सोरसराबा सुनल गेल बड़ बेसी । लोकतन्त्र में अपन अधिकार लऽकऽ रहत मधेशी ।। जनसंख्या सँ जनसागर में जोरल छलौं हम सीधा । खाकऽ हमहुं लाठी गोली पारकेलौं सबटा बाधा ।। बटवृक्षक अंकुर बनि जनमल कतेको आशा ।

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मैथिली गजल : एखन बाँकी अछि

~रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’~ करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि

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मैथिली कविता : हम युद्ध नहीं जित सकल छी

~नन्दलाल आचार्य~ (१) शान्ति आ सुव्यवस्थाकेँ अस्त्र बनेलिही केलही, बहुत केलही सभकऽ मनमनमे ढोल बजेलिही जीवनमे बारम्बार भूकम्प आनलिही सडक गरमेलही, निद्रा उडेलही सपना बाटलिही, अस्थिर भविष्य देलही कमै चेतना दैक ललिपप चटवैत तन, मन, धन लेलही, कोनकोनसँ समर्थन भेटलिही मुर्दा शान्तिक रट लगेलिही आ, एखन सल्गिपर सुतेलही ।

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मैथिली कथा : चौकपरक मौगी

~बृषेश चन्द्र लाल~ हँ, आब ओकरा चौके तँ कहैत छैक । नाम धएलकैक अछि मेगा चौक ! कनेक अङरेजिया नाम । एहिसँ नवतुरिया कर्णधारसभमे अपन मौलिकता, संस्कृति, भाषा आदि आ कही तँ साँच ई जे स्वयं अपनोप्रति बढ़ैत हीनताबोधक स्थिति सुझाइत अछि । ठीके कहैत छैक, दूरक ढम-ढम सभकेँ सोहाओन लगैत छैक । आब अपनासभक भाषासभपर आधुनिकताक नामेँ अग्रेजी आ पढ्नेक्रम जारी राख्नुहोस् →

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मैथिली गीत : सहिदक आत्मा जरए

~गजेन्द्र गजुर~ ननकिरबो मरए ,बुढबो मरए लइल अधिकार।। सहिदक आत्मा जरए,टसँमसाइ नहि जाली सरकार।। लहुमाला छिरियाल माएँ के आचरमे बोदम बोद नोर कऽ डिढीर फारल पाथरमे मिटौने नइ मिटत माँए मधेशक ललकार ।।

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