Category Archives: थारू भाषी रचना

थारू भाषी मुक्तक : मीठ मीठ गाला मर्ली

~चित्र लक्ष्मी~ पहिल भ्याँटम मीठ मीठ गाला मर्ली द्वासर भ्याँटम निंगारके प्याला भर्ली लौक लौक लौकती रह हमार प्रेमनैया-

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थारू कथा : बट्कोही हिरो

~सोम डेमनडौरा~ नेंढान टर्नि आज पुरा फिटान् बा । डोक्ल्याक डोक्ल्याक न्याँगटा सल् गल्ली । ज्यान कुन्टलसे ढ्यार हुइहिंस् । साँवर, ठुल ढ्यांग, डर लग्टिक अउर छन्डान जिऊ । पच्छिउँसे डौंक्टी आइटा । “टेरी गुन्डा सारे । आज टुहिन् चिर्के … Continue reading

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थारू भाषी मुक्तक : सिम फे किन्देनु

~सगर कुस्मी~ तुहिनसे बाट कारक लग सिम फे किन्देनु गलेम लागेन पाउडर, क्रिम फे किन्देनु अकेली रहो संग नै पके

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चित्र ‘लक्ष्मी’का थारू भाषी दुई हाइकुहरु

~चित्र ‘लक्ष्मी’~ झिङ्नी बेल्भार जोन्ह्याँ ओ अज्जरार दूर त नि हो ? औंसी ना पुन्नी

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थारू भाषी कविता : डहरचन्डीक बन्क

~सुशील चौधरी~ जन्नीह चिमचाम डेख्क जिन झंख्रहो ठर्वा, पटोहिया मौन बा कैक जिन डँक्रहो छावा, डाइ निब्वालठो कैक जिन ठौकहो बाबा । छाई मु सिलबाटिस् कैक जिन ढम्क्यइहो डमन्ड्वा,

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थारू भाषी गजल : पर्ख नि हुइ आब

~बुद्दिराम चौधरी~ आघ बर्ही सङ्घारी हुक्र पाछ पर्ख नि हुइ आब / नि हच्की नि डराइ यी ब्यालम डर्ख नि हुइ आब // लिखाइ अधिकार सम्बिधानम पहिचान सहित के / जितिह ेरहल्म फे हम्र सक्कुज मर्ख निहुइ आब //

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थारू भाषी गजल : कठु जाँरक भंक्री

~एम के कुसुम्या~ निदेलसे घरक मनै छोर्देम कठु जाँरक भंक्री कबु काल रिस लग्था फोर्देम कठु जाँरक भंक्री मै मटोर्या अस्त बातु जाँर निहोक निसेक्तु मै देना बा त देओ नै त चोर्देम कठु जाँरक भंक्री

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थारू भाषी कविता : खै, कहाँ बा भ्यालेन्टाइन !?

~लक्की चाैधरी~ बजारमे हल्ला बा, कति हुँ आइल बा भ्यालेन्टाइन ! एहोर ओहोर हेर्नु कोनुवा कप्चा निहर्नु नै लागल नजर कहुँ मनहे पुछ्नु खै, कहाँ बा भ्यालेन्टाइन !? बजार चोक चिया पसल, सडक गल्ली

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थारू भाषी कथा : कमैया बस्तीम् भगन्वा

~कृष्णराज सर्वहारी~ १ नेपालके मनै गरीब होके दुःख पइलाँ कहिके भगन्वा दानबीर बन्के अइलाँ । हुँकार आघे मंगुइयनके लाइन लाग गैलिन । – प्रभु मोर घर २ तल्ला किल बा । कम्तीमे ५ तल्ला टे बनाइ पाउँ । – प्रभु … Continue reading

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थारू भाषी कविता : सविनयाँ

~लक्की चाैधरी~ सवनियाँ गदरवा वर्खाबुन्दी बर्सल । कजरिया थर्कल बद्री जीउ माेर तर्सल ।। बर्का पानी बरसल अइसिन जाेर । मच्छीमारे गैलीगाेही खवइली झाेर ।।

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थारू भाषी गजल : पच्छिउँ से जागी हम्र युवा

~सुरज बर्दियाली~ उत्तर दख्खिन पुरुब पच्छिउँ से जागी हम्र युवा// समाज विकासके कर्तव्यसे जिन भागी हम्र युवा// बुँदा बुँदा पानी मिल्क जस्तक बनट समुन्दर, असम्भव हे मिल्के सम्भव बनाए लागि हम्र युवा//

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थारू भाषी मुक्तक : सडकमे अइठाँ

~छविलाल कोपिला~ कबो जाति विरोधी कबो अतिजाति सडकमे अइठाँ देखो यहाँ घेंघा फुलैटी उहे राष्ट्रघाती सडकमे अइठाँ यी देशके शासक ओस्ते हम्रहिन भेंरी नै कहल हुइही

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थारू भाषी बालकथा : पश्तो

~छविलाल कोपिला~ ‘अई ! ऊ लवन्डा हेरो कैसे–कैसे करटा ?’ ‘अई ! के हो ?’ ‘के रही, सझ्लान बर्किक छुट्की दुलरुवा छावा हुइन्, उहे हरबरिया, के रही ।’ ‘यी, दबवा पैनाहस्, यकर दाई–बाबा कुल नै हेर्ठुइस् कि का ?’ ‘हेर्हिस् … Continue reading

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थारू भाषी छन्द कविता : कहाँगिल अगहनिया नेन्धर ?

~लक्की चाैधरी~ छन्द : सवाई  कहाँगिल अगहन, थारुनके रीति ? हेरागिल हेर्तीहेर्ती, नेन्धरके मिति ?? भुलेलग्ली संसकृति, हेर्तीहेर्ती हम्रे । धेरजन्ना होकेहोकी, नैसेकली सम्ह्रे ।।१।। ढिक्रीबेचे जाइदुल्ही नातनके घर । निसफिक्री होकेबैठी नैरहिन डर ।। सबओर स्वतन्त्रता मनलग्ना दिन ।

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थारू भाषी मुक्तक : महजन्वक् ऋण चुकाब

~सत्यनारायण दहित~ प्रदेशसे आइतुँ डाई आब महजन्वक् ऋण चुकाब । लावा चोलिया गोनियाँ किने हसुलिया बजार जाब । बर्का बन्वम खर काटे बाबै आब जाई नै परहींन,

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थारू भाषी कविता : आपन भाषाहे छातीसे लगुइयन्

~अनिल चौधरी~ आपन भाषाहे छातीसे लगुइयन्, आपन अङ्नाहे देउना-बेब्री से सजुइयन्, कौन गल्लीमे हेराइल बटो, कौन कोन्टीमे खुस्टल बटो, दिन महिना बरस बीत गैल्, अब ते तोहार पहिचान फेन मेट गैल् /1/

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थारू भाषी समीक्षा : थारू भषासाहित्य और संस्कृतिके एक झलक

~अभितकुमार चौधरी~ पृष्ठभूमि खोला कताके ठण्ढा हावामे बहौत दिनसे कुदल चियै टुटल नै छै हमर बनेलहा घर सदियौँसे बैसल चियै । आपन मातृभषा, आपन परम्परागत रीतिरिवाज, बेग्ले किसिमके सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और लिखित या मौखिक इतिहास भेल जमा ५९ … Continue reading

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थारू भाषी गजल : तुह कहाँ रहो ?

~सीता थारू ‘निश्छल’~ जिन्दगीमे दर्नैं चिठ्ठा, तुह कहाँ रहो ? तुहिनहे मँग्नु भिक्षा, तुह कहाँ रहो ? हातमे लैके बरमाला ओ सेंदुर–टीका घनि–घनि दर्नैं झिँका, तुह कहाँ रहो ?

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थारू भाषी मुक्तक : बञ्जरभूमि

~छविलाल कोपिला~ बिना कारण हमार वस्ती बगाजाइठ् ओस्ते यहाँ रातारात आगी लगाजाइठ् हेरो ! यी बञ्जरभूमि,

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थारू भाषी कथा : कुवाँरी

~गुरुप्रसाद कुमाल ‘बुलबुल’~ ‘कुवाँरी…’ जाँच कोठमसे नर्स बलाइल् । नर्सक् बोलले कुवाँरीक ढेर घचिकके पटिस् लग्टिक अश्रा ओरागैलिस् । महिनावारी रुक्लक् ओरसे ऊ जचाई गैलरहे । ऊ आपन पाला अइलक ओरसे बलैलक् कोठम् गैल् । कुवाँरी कोठम् पुग्टी किल् नर्स … Continue reading

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थारू भाषी मुक्तक : ख्वाजल बाटु

~राम पछलदङग्याँ अनुरागि~ पह्रल लिखल निपतीत लाती ख्वाजल बाटु मनक पिर दुख बुझ्ना छाती ख्वाजल बाटु संघ मुना संघ जीना सहारा जिन्दगी भर

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थारू भाषी कथा : झुक्का

~छविलाल कोपिला~ सावन भादोके महिना । धान कहुँ गाम्हँर रहे, ते कहुँ फुटके बाला झुले । यहोंर डिह्वामे मकै अर्रायल् रहे । जब मकै खैना भर्याली हुइल् । डह्गिक–डह्गिक चिरैं आइलग्लाँ ओ मकै खाके सन्त्वाइलग्लाँ । चिरैनके अखवारी करक लग … Continue reading

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