मैथिली कथा : चौकपरक मौगी

~बृषेश चन्द्र लाल~Brikhesh Chandra Lal

हँ, आब ओकरा चौके तँ कहैत छैक । नाम धएलकैक अछि मेगा चौक ! कनेक अङरेजिया नाम । एहिसँ नवतुरिया कर्णधारसभमे अपन मौलिकता, संस्कृति, भाषा आदि आ कही तँ साँच ई जे स्वयं अपनोप्रति बढ़ैत हीनताबोधक स्थिति सुझाइत अछि । ठीके कहैत छैक, दूरक ढम-ढम सभकेँ सोहाओन लगैत छैक । आब अपनासभक भाषासभपर आधुनिकताक नामेँ अग्रेजी आ कतहु-कतहु लैटिन शब्दसभ चढ़ैत जा’रहल अछि । किछु दशक पश्चात् इएह शब्दसभकेँ लोक अपन कहए लागत । आब लोक अपनोकेँ विदेशी सन बदलए चाहैत अछि । केश रंगि लैत अछि ! सेहो एहन रंगमे, जे की कहू ? पहिने एहन केशबलासभकेँ गामघरमे खौंझबैत लोक भटरंगा कहैक । नीको कोना लगैत छैक नहि जानि ?! एहि शहरमे एकटा एहनो लोक छथि जे जवानीमे एक बेर विदेश गेला तँ अपन चमड़ीयोक रंग उड़ा लेलैन्हि । एखन उमेर बढि गेलनि तँ केशो रंगब मोसकिल भ’ गेल छन्हि । चोकटल मुँह-कान, देहपरक उड़ल चमड़ी आ देशी केश ! सोचि सकैत छी जे केहन लगैत हएतैन्हि !! भेलै छोड़ू, आबक बोलीचाली एहिना होइत छैक ! एहि शब्दसभक ज्ञान बिनु आब काज कहाँ चलैत छैक ?! आ तैँ आब बूढ़ो-पुरानसभ एहि शब्दसभक प्रयोग करए लागल छथि । देहातक सेहो आब तेजीसँ शहरीकरण भ’ रहल छैक । काल्हितकक बाध आ चओर जे धान, गहूम आ तरकारीक खेतीसँ लहलहाइत छल, तइ हरितक्षेत्रपर देखिते-देखिते धराधर चारुभर घर, बंगला, महल आ शापिंग अट्टालिका ठाढ भ’ गेल अछि । फूसबला गरीबी राताराती अमीरीक अम्बारमे बिला गेल अछि । चारू भर अकस्मात् विलासिता बरसि गेल छैक । पुरनका खेतिहरसभ अपन नेनाभुटकाकेँ दूर ठाढ़ भ’ कोनो-कोनो निर्माण देखबैत रहैत अछि । शायद पहिने अपन छल से कहैत रहैत अछि । बच्चासभ नहि जानि की सोचैत गुम्म रहैत अछि । परिवर्तनक गति तीब्र छैक । एक्के दू बरखक अन्तरालमे एहि टोलमे आबैबलाकेँ लगतैक जेना भुतला गेल छी । … अपेक्षाकृत नीक मुदा सस्त डेरालेल हम ओहि नव टोलमे बास धएने रही । पहुनका माटिबला सडकसभ आब गिट्टी आ धीरेधीरे पीचमे बदलि गेल अछि । पहिने तँ कोनादन लगैत छल — शहरक बजार लग होइतो घूमिकए जाए पड़ैत छल । आब नदीक आरपारलेल दूलेनियाँ पुल बनि गेल छैक । तैँ डेरासँ निकलएबला गल्ली आब सामान्य सड़क भ’ गेल अछि आ पुल बनि गेलासँ चौड़ा सड़क मिलएबला जगह बस सोझहिं चौक भ गेल छैक । पहुनका अन्न आ तरकारी बजारमे भाड़पर ल’ जा’ क’ बेचएबला कृषकसभ आब आराम करए लागल अछि आ ओकर बेटासभ जमीनक महँगीक लाभ ल’ कि तँ बिजनेश कए मालामाल भ’ गेल अछि अथवा फुटानीसँ बर्बाद ! कएटाक कानमे कुण्डल झूलैत रहैत छैक आ ओसभ आमदनीक वास्ते मारिपीट चाहएबला असामीक खोजमे चौकपर ठहक्का दैत विज्ञापन करैत रहैत अछि । चायपानक व्यवस्था फोकटमे । कारण ओकर नङ्गोटिया बेपारीसभ एकरा अपन जिम्मेदारी बुझैत अछि । संगीसभकलेल सहयोगक सट्टो आ अपन अदृश्य सुरक्षा व्यवस्थामे मजबूतीयो —दुनू लक्ष्य एक्के लाठीसँ सम्हरि जाइत छैक ।

चौकक चारुभर मधुरक स्वीटहोम्स आ विभिन्न सौन्दर्य सामग्रीक कासमेटिक स्टाइलिस दोकानसभ खुलि गेल अछि । भिनसरमे आफिसवास्ते निकलैत छी तँ चौकपर जमबएबलासभक नीक जुटान रहैत अछि आ साँझमे पूरा शहरिया भीड़ । तरकारी आ सामान्य बजारलेल तँ लोक अबिते अछि, छोटछीन किनमेल अर्थात् शापिङ्गवास्ते नव धनाढ्य महिला लेडिज आ झिल्लिका स्पाइसीसभक भीड़ सेहो लागि जाइत छैक । मालकोसक स्थानपर रॉकसँ चौक गुञ्जैत रहैत अछि । रंगीन रोशनी आ इलेक्ट्रोनिक इजहारक प्रयोगक प्रारम्भसँ बुझाइत रहैत छैक जे टोल तथा चौक आब आधुनिकताक उच्चतम बिन्दुपर अपन अर्जुनदृष्टि टिका चुकल अछि आ आब पाछाँ घुमिकए कहिओ नहि देखत । मुदा, एकटा कोन्ह उदास छैक । ओहि घराड़ीपर प्रायः कोनो झगडा छैक तैँ एखनो खाली अछि । जंगलिया घासफूस आ किछु परतीक झारभङ्गोरक एक मात्र स्थल आब इएहटा बाँकी छैक । ओतए मकैक ओरहा करएबलासभ अपन रोजगार करैत अछि । किछु खुदड़ा सिगरेट, बीड़ी आ गुटकाबलासभक जोगार सेहो चलि जाइत छैक । ओही घराड़ीक जमीनसँ डेढ़ दू हाथ उपर उठल कम्पाउण्डवालपर एकटा मौगी बैसलि रहैति अछि । चुपचाप चारुभर तकैति, कखनो पएरक औंठासँ माटि उकटैति तँ कखनो मुड़ी गोंतने । अछि अतीव सुन्दरि । मैल–झेल सलवारकुर्तीक बादो ओकर कसल, उठल, आकर्षक वक्ष आ गोर–ललोन वर्ण सुन्दरताकेँ मलीन नहि करए पाबिरहल छैक । श्रृंङ्गार–पटारक नामोनिशान नहि छैक । केशमे जेना महीनोसँ तेल नहि पड़ल होइक, कनेक जटाएल जकाँ लगैत छैक । मुदा माङमे सदिखन पूरा सिन्दूर थोपल रहैत छैक । शायद सभदिन ओ सिन्दूरधरि जरुर करैति अछि । हम हरेक दिन लगभग १० बजे आफिस निकलैत छी तँ ओ ओतए बैसले रहैति अछि । शायदे कहिओ नहि देखने हएबैक । आ तहिना ५ बजेक बाद घुरैतकाल ओ ओत्तहि बैसलि रहैति अछि । ओही ठाम कनेको एम्हर–ओम्हर घुसकल नहि । आब तँ हमर आदति भ’ गेल अछि । घरसँ निकलिते हम ओहि चौकपर ओकरादिस एक बेर देखैत छिऐक आ घुरतीमे चौकपर पहुँचिते हमर आँखि ओकरहिं खोजए लगैत अछि । हमरा चौकपर भ’ रहल आओर गतिविधिसँ कोनो खासे मतलब नहि रहैत अछि । … जहिआ नहि देखैत छिऐक हमर मोन उद्विग्न जकाँ भ’ जाइत अछि । पता नहि किआ हमरा ओहि मौगीपर बेशी सहानुभूति भ’ गेल अछि । जकरा स्वीकारएमे हमरा संकोच जरुर अछि मुदा ई सत्य छैक । ओ मौगी हमरा एना आकर्षित नहि करैति । मुदा एक दिन पुल लग कोनमे ओकरा हम हाँइहाँइ किछु पचलपीचल लतामसभ खाइत देखने रहिऐक । प्राय: कोनो फलफूलबला ओतए उझलि गेल रहैक । तहिआ ओकर कपड़ालत्ता साफ आ नीक रहैक । हमरा तत्क्षण लागल रहए जे ओ नीक परिवारसँ अछि आ शायद कोनो विपत्तिमे अछि । लागल केओ एतए फँसाकए आनिकए छोड़ि तँ नहि देने छैक । हमरा भीतरसँ इहो लागल रहए जे एकरा एकर स्थितिक बारेमे पुछितिऐक । मुदा फेर रङविरङक बात दिमागमे आबि गेल । लोक की कहत ?! कहूँ कोनो गड़बड़ मौगी हएत तँ !! आ हम आगाँ बढ़ि गेल रही । घुरतीमे चौकपर ठाढ़ भ’ हम ओकरा पुल लग खोजने रहिऐक मुदा देखलिऐक नहि । लागल चलि गेलि हएति । मुदा, तकर किछु हप्ताक बाद जखन ओकरा ओहि कम्पाउण्डवालपर ओना बैसलि देखलिऐक तँ लागल जेना चिन्हैत होइऐक । दूचारि दिन देखैत–देखैत ठेकानपर आएलि जे हो न हो ओ उएह मौगी अछि । आ फेर ओहिना हम देखैत रहलिऐक । सभ दिन मोन होए जे एकरा किछु पुछैत छिऐक, मुदा ओतेक साहस नहि जुटा सकलहुँ ।

* * * *

— æ राजेशजी, कनेक ओम्हर तकिऔक तँ !”
— æ कोम्हर ?”
— æ ओम्हर ! … ओहि कम्पाउण्डवालपर । ओहि मकैक ओरहा बेचएवालीक लग जे भीड़ छैक, तकर पाछाँ !”
— æ हूँ, एकटा मौगी तँ छैक !”
— æओकरा हम सभ दिन अहिना बैसलि देखैत छिऐक । एसगरे ! … कखनहुँ ककरोसँ बतिआइतो नहि अछि । अहिना असगरे बैसलि रहैति अछि । सभ दिन आफिस जायकाल देखैत छिऐक, अहिना बैसलि आ घुरतीमे सेहो नजरि पड़ि जाइत अछि । अहिना असगरे बैसले रहैति अछि ।”
— æहेतै केओ !”
— æकोनो विपत्तिमे अछि की ?!”
— æभ’ सकैत अछि । मुदा, करबैक की ? एहन बहुते छैक, एहि महानगरीमे !”
— æसे तँ ठीके कहलहुँ । … तैयो एकर समस्या की छैक से जनबाक मोन करैत अछि ।”
— æतँ जा’ क’ पूछि आउ !”
– “ मनमे तँ कए बेर आएल, मुदा साहस नहि जुटा पाबिरहल छी ।”
– “ छोड़ू ! कहुँ कोनो एहन-तेहन बात हएत तँ अनावश्यक फँसि जाएब । … आ कहूँ खराब मौगी हएति तँ लोक की कहत ? ”
— æसे तँ ठीके कहलहुँ । … मुदा मानवीय संवेदना आबि जाइत अछि ।”
— æ अहाँ भावनामे बहि जाइत छी । कतेकेँ देखबैक ?! हम अपने बहुत रास समस्यामे फँसल छी । पहिने हमरे मदति करु । दोसरक मदति पाछाँ करब । … भौजी सुनतीह तँ मारि बेलन ठीक क’ देतीह !”
— æअहँकेँ मजाक सूझैत अछि ! … हम छी मुदा गम्भीर !! सिउँथमे देखैत छिऐक, मोटगर सिन्नुर थोपने अछि । एहिसँ तँ पक्का छैक जे ओ अपनेसभक दिसक अछि । ”
— æसे तँ लगैत छैक, मुदा आब पहिने जकाँ छैक जे एक–दू गोटे ओम्हरक एहि नगरमे अबैत अछि । … आब तँ साँझमे चढ़ल आ भोरे पहुँचल । एकटा जमाना रहैक जे बाटा कम्पनीक ओ साहुजी न्यूरोडमे पीपर गाछलग ठाढ़ अबेरतक जकरा देखैक अपन डेरामे ठौर द’ दैक । आब तकर जरुरी नहि छैक ।”
— æअरे वाह ! … अहाँ अम्बेसडर साहेब मोन पारि देलहुँ । की नाम रहनि, हुनकर ?”
— æनाम तँ नहि याद अछि । केओ नाम कहाँ लैक, सभ तँ एमबेसडरे ने कहैक मुदा रहथि ओ साहुजी । अपने दिसक ।”
— æठीके ! ओ महान रहथि । पर्सनलीटी एहन जे बुझाइक खूब नम्हर आदमी हएत । शूट-टाई पहिरने वेलड्रेस्ड, पएरमे एम्बेसडर जुत्ता आ कानक अन्तिमतक बाबरीक पट्टी । हुनकर कारी, साफ पालिस्ड एम्बेसडर जुत्ताक कारणेँ लोक एम्बेसडर कहन्हि !”
— æसे नहि कहिऔक, ओ ठीके नमहर आदमी रहथि । जतेक लोक अबैक तकरासभकेँ मदति करथिन्ह । लोककेँ खोजएमे, रस्ता देखाबएमे, पहिल बेर आएल अछि तँ ठौरतक पहुँचाबएमे सहयोग करथिन्ह । कोनो जोगार नहि होइक तँ अपने डेरामे रातिभरिलेल अतिथि बना लेथिन्ह । बाटा कम्पनीमे काज करथि । दोकान बन्द होइते पीपर गाछलग आबि हेराएल–भुतलाएल लोकक खोजी करथि । इहो दैनन्दिनीक एकटा अंग रहन्हि !”
— æसभ दिन साँझमे ओ पीपर गाछलग जएबे करथिन्ह, नहि ?”
— æ सभ दिन ! … प्रायः केओ ने केओ भेटिए जाइन्ह । लगपासक होइक तँ जकरा खोजैत रहैत तकर डेरा पहुँचा देथिन्ह । नहि तँ अपना ओहिठाम ल’ जाथिन्ह ।”
— æसएह तँ, आब ओहन लोक कहाँ भेटत ?!”
— æओ होटलमे खाथि । जे भेटैन्हि तकरा पहिने होटलमे ल’ जाथिन्ह ।”
— æभोजनो करबथिन्ह, ?”
— æहँ, कैंचा नहि छैक तँ पाइयो द’ देथिन्ह । … घर घरएलेल भाड़ा किराया नहि छैक तँ सेहो सहयोग करथिन्ह । कतेक घुरा दैन्हि आ कतेक हुनकर सदाशयताकेँ कमजोरी बूझि ठकि सेहो लैन्हि ।”
— æबहुतके उपकार कएलखिन्ह ओ । हमरा एखनो ओ बाटाक दोकान मोन पड़ि जाइत अछि ।”
— æमुदा ओ तँ कहिआ उठि गेल !”
— æतैयो ओतए जाइत छी तँ लगैत अछि जे छैहे । … हुनकर उपकारसँ कतेकेँ कल्याण भेल हएतैक !”
— æमुदा, एकटा बात तँ जनिते हएब । … हुनका किछु स्वनामधन्य बडकाÞसभ कहथिन्ह जे ओ साहुजी इन्टेलीजेन्सकेँ आदमी अछि । अपनासभक दिसक लोकसभपर नजरि रखैत अछि । … आ बेशी लोक पतिआ’ सेहो जाइक । ”
— æअपनासभक समाजक इएह तँ बड़का रोग छैक । अपने करब नहि आ केओ करत तँ ओकरा पतित बनाकए प्रस्तुत करब ।”
— æतैँ तँ कहलहुँ अपन भावनापर नियन्त्रण राखू । … चलू, आब अबेर भ’ गेल !”
— æसे तँ ठीके कहलहुँ । … चलू !”

* * * *

छुट्टीक दिन अबेरतक सुतब हमर आदति अछि । सृजना सेहो बुझाइत अछि अबेरतक सुतले छलीह । जखन चाय बनाकए ओ हमरा जगओलीह तँ आठसँ बेसी भ’ गेल छलैक । कहलन्हि — æ आइ हमरो अबेर भ’ गेल । उठू ने, भानसमे सेहो अबेरे हएत । … हरियर साग सेहो नहि छैक। चौकदिस कनेक देखितिऐक !” आ तैँ बाथरुमसँ निवृत होइतहिं चौकदिस गेल रही । ओहि देवालपर नजरि जाएब स्वाभाविके छल । ओ एखन ओतए नहि छलि । डर भेल, जे कतहुँ कोनो विपत्तिमे तँ नहि फँसि गेल । … केओ उठाकए तँ नहि ल’ गेलैक ? कोन ठेकान ! यौनपिपासुसभक लेल एहन अबलासभ गरम सेकुवा आ सोनक चिरइ होइत छैक । मन खिन्न आ भारी भ’ गेल । सोचए लगलहुँ जे हमरा ओकरा पूछए चाहैत छल । पूछि लेलासँ की बिगड़ि जइतैक ? किछु करए सकितिऐक तँ कमसँकम समयपर तँ होइतैक । फेर राजेशजीक बात मोन पड़ि गेल । भावनामे नहि बहक चाही आ हम अपन डेग तरकारी बजारदिस बढ़ा लेलहुँ ।

ओहि दिन हम साग किनैत काल बेसी मोलमोल्है नहि कएने रही । उनटपुनट सेहो नहि । पालक देखलिऐक आ जे कहलक से दैत सागक झोरा लटकओने घूरि गेल रही । चौकपर फेर नजरि अनायासे ओही देवालपर ठमकि गेल । ओ ओहिना सिन्दूर थोपने बैसलि छलि । भीतरे–भीतर प्रसन्नता भेल छल । बेसाहल चिन्ताक बोझ जेना उतरि गेल होए । लागल, कमसँकम ओकर कोनो ठौर तँ छैक ! रातिमे कतहु रहैति तँ अछि !! ठौर छैक तँ खाइतो–पिबैति अवस्से हएति !!!

घर अएलहुँ तँ राजेशजी एकगोटेक सङ प्रतीक्षा करैत रहथि । नमस्कारपाती भेल । राजेशजीकेभ देखि मन खिल गेल रहए । छुट्टीक दिन हमर सङ इएह दैत छथि । हमर पुरान मित्र छथि । बड्ड रसिक लोक । गम्भीर हास्यमे नीक दक्षता छन्हि । हिनक ठिठोलीमे भरल दार्शनिकता हमरा मोहि लैत अछि । खूब बतिआइत छी हमसभ । अपना पहुँचक विषयसभपर भरिपोख बहस क’ लैत छी आ गम्भीर विषयसभपर राजेशजीक वस्तुपरक विश्लेषणसँ ज्ञानक सङहिं मनोरंजनो भ’ जाइत अछि । … हम पालक राखि सोझे राजेशजी लग अएलहुँ तँ ओ सङहि आएल व्यक्तिसँ परिचय करबैत बजलाह — æ पहिने परिचय करु ! ई छथि स.ई. राम दयाल यादव, एहि टोलक पुलिसक इनचार्ज !! अपनेसभक दिसक छथि । आब सुरक्षाक विषयलेल निश्चिन्ते बुझू । जखन देआदे थनेदार तँ डर कथिक ? आ ताहूमे देआदी झगड़ाक सम्भावना शून्य तँ दुश्मन पड़एले रहताह ने !”

æबड्ड खुशी भेल । वाह !” — हम अपन हर्ष रोकि नहि सकलहुँ — æअबैत रहब । कतेक नीक लगैत अछि । … हम वन विभागमे छी । अही ठामक थनदार छी तँ सहयोगक बेगरता कखनो पड़ि सकैत अछि । … मुदा अहाँसभ छी घुमन्तू तैँ अपन फोन द’ दिअ ! … आ हमरो राखि लिअ ।”

æजी अवश्य !” – सब–इन्सपेक्टर साहेबक आँखि चमकिरहल छल — æजी अपन नम्बर कहलजाय ।” ओ मोबाइल निकालि बजलाह । हम अपन नम्बर कहलिअन्हि आ ओ मीसकाल कएलन्हि । दूनूगोटे सेभ कएलहुँ । ताबत सृजना चाय ल’ अनने छलीह । हुनकोसँ परिचयपात भेलनि । नमस्कार क’ ओहो बैसि गेलीह । हालछेम, गामघरक चर्चा आहेमाहे चलैत रहल । मुदा, रहि-रहि क’ हमरा उएह मौगीक याद अबैत रहए । सोचैत रही जे सृजना उठैथि तँ चर्च करी । तैँ जखन भानसक ध्यान अएलापर ओ उठलीह तँ हम बाजि उठलहुँ — æबाइ द वे, एकटा बात अहाँक ध्यानपर राखि दैत छी !”

æजी, कहलजाओ ने !” — हुनका बुझएलन्हि जे ओ कतेक महत्वपूर्ण छथि ।

æएहि चौकपर एकटा मौगीकेँ हमरासभ देखैत रहैत छिऐक । प्रायः अपनेसभक दिसक अछि । भोरेसँ रातिधरि एकहि ठाम बैसलि रहैति अछि । कखनो स्थान फेरने नहि देखैत छिऐक । उएह सलवारकुर्ती मुदा मोटगर सिन्दूर सभ दिन ताजा रहैत छैक । आँखिमे काजर सेहो । ”

æजी हम जनैत छिऐक ओकरा ! … देवालपर बैसलि रहैति अछि । पुरूब मुहेँ सएह ने ? ” — ओ अपन पुलिसिया स्कील बघारलन्हि ।

æके अछि ओ ? ” — हमर जिज्ञासा बढ़ल । राजेशजी अस्वभाविक रुपसँ चुप्प रहथि ।

æहमरा लगैत अछि, ओ मानसिक रुपसँ बीमार अछि । पूछताछ कएने रहिऐक । किछु बजिते नहि अछि । सभ बातमे चुप्पी । … हम जहिआ एतए ज्वाइन कएलहुँ, छौंड़ासभ पकड़िकए अनने रहए । कहैत रहए जे ओहि दिवालपर भरि दिन चुपचाप बैसलि रहैति अछि । अबेर राति फेर गायब भ’ जाइत अछि आ सबेरे ९ बजेक बाद फेर ओत्तहिं ।” — यादव रिपोर्टक अन्दाजमे कहलन्हि ।
æकी पता लगएबैक ? किछु बाजए तखन ने ! … खाना देलकैक छौंडाÞसभ तँ हबड़हबड़ खा’ लेलकि आ हाथ धो क’ फेर चुपचाप बैसि रहलि । हम कहलिऐक जे भिनसरमे छोड़ि दिअहीक । … खबरदार जे कोनो शिकायत सुनए पड़ए ! ” — सब–इन्सपेक्टर अपनाकेँ नीक प्रमाणित करैत कहलन्हि ।
æहूँ !” — हम नमहर साँस तनैत कहलिऐक ।
æजी ! … छोड़लजाय । एहन बहुत छैक । कतेकक पाछाँ पड़ब ? … माइक जीरोजीरो फोर … । ” — कहैत ओ बाहर निकलि गेलाह, वाकीटाकीमे घरघराइत केओ किछु कहैत रहैक । कनेक कालक बाद घुरलाह तँ कहलन्हि — æहमरा तँ दौड़ि जाय पड़ल । नमस्कार । … फेर कहिओ आएब ।” आ ओ तेजीसँ निकलि गेलाह ।
æभेल कि ने ! … अहाँकेँ कोन सूरपर चढ़ल अछि ओ मौगी, से नहि जानि ! ने चिन्हा ने जानी आ तैयो एतेक किआ परेशानी !! … नहि बुझि सकलहुँ ।”— राजेशजी तमसाइत बजलाह —æपढ़ाकए चलि गेल ने । की बुझने हएत ओ !”
æ की बूझत ? कोनो अनर्गल बात तँ छैक नहि । कहए ई चाहने रहिऐक जे ओ किनसाइत किछु पता लगबैत ! ओकरो जानकारी तँ छैक । आखिर ओ मौगी समस्यामे अछि से बूझएमे तँ आएल !!” — हम राजेशजीकेँ समझबैत कहलिअन्हि —æओ भूखल रहैति अछि । असहाय अछि !”
æ अहाँक भावना हम बूझि सकैत छी मुदा एहन तँ कतेको अछि । अहाँ सभकलेल करए सकबै ? ओ मौगी अछि तँ बेशी ध्यान चलि गेल, सएह ने !” — राजेशजी नहि जानि कोन अर्थमे बुझने रहथि, तथापि हुनक हमराप्रतिक सकारात्मक आ सहयोगी दृष्टिकोणपर शंका नहि भेल । ओ अपना हिसाबेँ हमरा भसिआएसँ बचबए चाहैत छलाह । धमकबैत कहलन्हि — æभौजीकेँ कहि दैत छिअन्हि !” हम अपन हाथक इशारासँ मना करैत उठि गेलहुँ । ओहो संकेत बुझैत साँझमे फेरो आएब कहैत उठि गेलाह । जीमे दम आएल । सृजनाकेँ ओना सुनओनाइ कहुना नीक नहि होइत । चाहे शिक्षित होए वा निरक्षर आखिर माउगि तँ माउगे होइत अछि ने ! यदि कहबो करबन्हि तँ हमहीं किए नहि कहबन्हि । हम अपन माथ झटकलहुँ आ बाथरुममे स्नानहेतु पैसि गेलहुँ ।

* * * *

रबी एहि चौकक दादा अछि । सभ छौंड़ासभ ओकरे पाछाँ रहैत छैक । अछि तँ ददे ! दादागिरीक सभ गुण छैक आ तैँ सभ किछु करैत अछि !! मुदा, अछि रचनात्मक । एहि टोलक लोकक सहयोगी । बिआह–दान आ सभ सांस्कृतिक, वैकासिक तथा सार्वजनिक काजमे बेस सक्रिय रहैत अछि । टोलक स्वीरेज, जल–प्रवन्धसँ ल’ क’ सड़क विभाग सड़क बनबैत अछि तखनो ओ हाजिर रहैत अछि । इएह कारण छैक जे सभ ओकरा पसिन करैत छैक । हमरो ओ नीक लगैत अछि । एहन दादा टोलक लेल नीके होइत छैक । … ओकर नियमसभ छैक । टोलमे केओ चोरी-चकारी, छेड़-छिनरिपन, बेईमानी नहि करत आदि–आदि । किछु भेलैक आ पता लागि गेलैक तँ ओ सम्बन्धित लोकसभकेँ बैसाओत आ दण्ड–जुरमाना करत । निर्णय ओकरे होइत छैक मुदा करैत अछि ओ सम्भव न्याय । हँ, ओ दोकानदारसभसँ महीनबारी लैत अछि । चुनावमे जकरा कहतैक तकरे भोट दिऔक से ओकर आग्रह रहैत छैक । लोक मानबो करैत छैक । ओना जे पहिनहिंसँ कोनो पार्टी धएने रहैत अछि से अपना मने भोट खसाबो मुदा टोलमे ओकरे प्रचार चलतैक !
रबी हमरा बहुत आदर करैत अछि । कारण हमरा नहि बूझल अछि । भ’ सकैत अछि एहि टोलक पुरान बासी भेलाक कारणेँ एना करैत हुअए । २५ बरस पहिने हम एहि टोलमे अएलहुँ तँ ओ बच्चे रहए । ओहि दिन दोकानपर गेल रही तँ रबी भेँट भ’ गेल । नमस्कार कएलक । हमहूँ हालचाल पुछलिऐक । ओ नीक कहैत दुनू हाथ जोड़ने ठाढ़े रहल । आगाँ की पुछिऔक से फुड़ाएल नहि । मुँहसँ बहरा गेल —æरबी, एकटा बात पुछिअह ?”
æजी, कहलजाय ने !” — ओ सावधानीसँ आग्रह कएलक ।
æ चौकपर ओ जे मौगी बैसल छैक से के छैक ? सभ दिन अहिना चुपचाप बैसलि रहैति अछि !”
æहमहुँ अहिना देखैत छिऐक । ककरोसँ किछु बजैति नहि अछि । केओ किछु खाएलेल दैत छैक तँ झट्ट द’ ल’ लैति अछि बस ! … शुरुमे लागल जे एकरा किछु सहयोगक आवश्यकता छैक । घुमाफिरा क’ पुछलिऐक, मुदा कोनो उत्तर नहि देलकि तँ छोड़ि देलिऐक । रातिमे अबेरतक एतए रहैति अछि । पता नहि फेर कतए चलि जाइत अछि । एहि टोलमे तँ ओकर घर वा डेरा नहि छैक ! प्रायः मति खराब छैक वा केओ असगर छोड़ि देने छैक ।” — ओ अपन अन्दाज कहलक — æएहि टोलक ओकरा केओ किछु क’ नहि सकैत अछि । दोसर ठामक बात नहि जानी । … हँ, एक दिन पुलिससभ पकड़ि क’ ल’ गेल रहैक । संगीसभ सुनओने रहए । कहाँदोन ओ कोनो प्रतिकार नहि कएलकि । तैँ हमहूँसभ अन्ठा देलिऐक ।”
æहूँ… !” — हम कनेक गम्भीर भ’ गेल रही आ चोट्टहिं घुरि गेल रही ।

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एहि बीचमे नहि जानि कतेक महीना भ’ गेलैक । हम ओकर चर्च कएनाइ छोड़ि देलहुँ । हँ, जाइत-अबैत ओकरा देखिऐक जरूर । ओकराबारेमे जानएक उत्कण्ठा मेटा नेने रही । ओहि दिन आफिस जाइत काल चौकपर पहुँचलहुँ तँ चौकपर भीड़ लागल रहैक । उत्सुकता जागल । मोटरसाइकल ठाढ़ कए भीड़दिस बढ़लहुँ । उएह मौगी घामेपसीने नहाएल चिचिआइत रहए । कखनो केश तँ कखनो अपने लत्ता नोचए । कखनो लोककेँ देखि भोकासी पारि कए घेओना पसारए । आँखि कहैक जेना ओकर सभकिछु केओ छिनि नेने होइक । निरीह आखियेँ ओ लोककेँ देखए आ फफकि-फफकि कानए । आ फेर पहिनहिं जकाँ कखनो केश तँ कखनो अपने लत्ता नोचए । साँस भाथी जकाँ ऊपर-नीचा होइक । … हम सुन्न भ’ गेल रही । कोलाहल रहैक । के की कहैक जानि-बुझि नहि सकलिऐक । … ओ आब खूब चिकरए लागलि छलि । ओकर भाषा नीक छलैक । लागल निश्चितेँ पढ़लि-लिखलि अछि । ओ जोर-जोरसँ चिकरैति रहए – “ हँ, हम चौकपरक मौगी छी ! … अही योग्य !! … सभ भोगू ! … तागत देखाऊ !! … चौकपरक मौगीपर … जे निरीह अछि … आ ने जकर केओ रक्षक छैक … तकरापर जोरजुलुम करू, पुरुषत्व देखाऊ ! … बाप रे ! … हम आब चौकपर मौगी छी !! ”

लागल जेना खसि पड़ब । स.ई. यादवजीक सेहो बदली भ’ गेल छलन्हि । ककरा कहिऔक ? आन दिन आनन-फाननमे पुलिस पहुँच जाइत छल । आइ पुलिससभ कतहुँ देखाइ नहि पड़ैत अछि, जेना ओ सभ अपने डेराएल नुकाएल होए । आफिस नहि जा सकलहुँ । कहुना डेरा अएलहुँ आ ओछाओनपर पसरि गेलहुँ । लागल, हमहुँ अपराधी छी । ओकरा पूछने रहितिऐक आ जौँ ओ बतओने रहैति तँ जरुर कोनो ऊपाय निकलल रहितैक । आइ एहन स्थिति नहि अबितैक ! ‘लोक की कहत ?’ – एहि डरेँ नहि डेरइतहुँ तँ एना नहि होइतैक । हम अपराधी छी ! चारूभरक लोक अपराधी अछि !! आओरक छोडू, हम ठीके अपराधी छी !!!

February 21, 2010

(स्रोत : Brikhesh’s Blog)

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